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Monday, July 6, 2009
आओ दो एक लम्हे मेरे साथ गुजारो,
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आओ दो एक लम्हे मेरे साथ गुजारो, में भी तुम जैसे बेबस और बेपनाह हूँ, मेरे दिल में भी यादों का धुआं भरा है, मेरे दिल में भी हसरत की चिता न जाने कब से अब तक सुलग रही है,लेकिन मैं अपने ग़मों को अपने अंदर ही दफन किये हूँ, तुम पर क्या , मैंने अपने पर भी, अपना दर्द ज़ाहिर न होने दिया है, मैं हंसती हूँ, पहले कोशिश से हंसती थी, अब हँसने की आदत है, आओ तुम्हारे दर्द भरे लम्हों को, अपनी इसी आदत की तेज़ हवा में उड़ाकर दूर भेज दूं, हो सकता है फिर तुम भी, अपने गम सीने में दफन कर, मेरी तरंह हंसने लगो............. Aao do ek lamhe mere sath guzaro, main bhi tum jaise bebas aur bepanah hun, mere dil mein bhi yaadon ka dhuan bhara hai, mere dil mein bhi hasrat ki chita na jane kab se ab tak sulag rahi hai, lekin mein apne gamon ko apne andar hi dafan kiye hun, tum par kya , main ne apne par bhi, apna dard zahir na hone diya hai, main hansti hun, pahale koshish se hansati thi, ab hansne ki adat hai, aao tumhare dard bhare lamhon ko, apni isi adat ki tej hava mein udaakar dur bhej doon, ho sakta hai phir tum bhi, apne gam sine mein dafan kar, meri tarah hansne lago............. |
रफ्ता रफ्ता मैं तुम्हें अच्छी लगूंगी
रफ्ता रफ्ता मैं तुम्हें अच्छी लगूंगी अजनबी हूँ आज कल अपनी लगूंगी , रेत जीतनी प्यास लेकर जब छुओगे, मैं हूँ तो साहिल पर तुम्हे दरिया लगूंगी ... सल्तनत एहसास की तुमको मिली तो, मैं तुम्हे जागीर का हिस्सा लगूंगी , बंद करके आँख जब देखोगे मुझको, कल सुबह देखा हुआ सपना लगूंगी .......... गर महसूस मुझको दिल से कर सकोगे, प्यार का बहता हुआ झरना लगूंगी , मेरे होठों की अजब तासीर है ये, में हूँ समंदर पर तुम्हें प्यासा लगूंगी....... मुझको खोकर जिंदगी में जब मिलोगे, क्या पता मैं उस समय कैसी लगूंगी, रफ्ता रफ्ता मैं तुम्हे अच्छी लगूंगी, अजनबी हूँ आज कल अपनी लगूंगी .. Rafta rafta main tumhen achchhi lagungi ajanabi hun aj kal apani lagungi , ret jitni pyas lekar jab chhuoge, main hun to sahil par tumhe dariya lagungi ... saltanat ehsas ki tumko mili to, main tumhe jagir ka hissa lagungi , band karke ankh jab dekhoge mujhako, kal subah dekha hua sapna lagungi ........... gar mehsus mujhko dil se kar sakoge, pyar ka bahata hua jharna lagungi , mere hothon ki ajab tasir hai ye, main hun samandar par tumhen pyasa lagungi....... mujhko kho kar zindagi mein jab miloge, kya pata main us samay kaisi lagungi, rafta rafta main tumhe achchhi lagungi, ajnabi hun aj kal apani lagungi .. |
तूफान से डर जाने का हुनर मुझ में नही....
मैं खुद को कुछ इस तरह पाती हूँ ... चेहरे बदलने का हुनर मुझ में नहीं , दर्द दिल में हो तो हसँने का हुनर मुझ में नहीं, मैं तो आईना हुँ तुझसे तुझ जैसी ही मैं बात करूं, टूट कर सँवरने का हुनर मुझ में नहीं । चलते चलते थम जाने का हुनर मुझ में नहीं, एक बार मिल के छोड जाने का हुनर मुझ में नहीं , मैं तो गंगा हूँ ,बहती ही रही , तूफान से डर जाने का हुनर मुझ में नही.... . . . . . . . . . main khud ko kuchh is tarah paati hun ... chehre badalne ka hunar mujh mein nahin , dard dil mein ho to hansne ka hunar mujh mein nahin, main to aina hun tujhse tujh jaisi hi main bat karoon, toot kar sanvarne ka hunar mujh mein nahin , chalte chalte tham jane ka hunar mujh mein nahin, ek bar mil ke chhod jane ka hunar mujh mein nahin , main to ganga hun ,behti hi rahi , tufaan se dar jane ka hunar mujh mein nahin.... |
फिर कोई बेटी न पैदा हो
न चाहते थे मगर वजूद में आना पड़ा हमें
खतायें थीं किसी की, सर झुकाना पड़ा हमें
जिस्म से खेलकर मेरे दरिंदे बरी हो गये
तोहमतों को मगर उम्र भर उठाना पड़ा हमें
रस्मों के नाम पर कभी, जुल्मों के नाम पर
सुलगती आग में खुद को जाना पड़ा हमें
दुआओं के शहर में भी तू नहीं था मेरे मौला,
हर बार वहाँ से खाली हाथ आना पड़ा हमें
फिर कोई बेटी न पैदा हो तेरी ज़मीन पर,
ये सोचकर शम-ए-हयात बुझाना पड़ा हमें
इस पेट के लिये तो कभी बच्चों के वास्ते,
जहाँ पे जाना पाप है, वहीँ जाना पड़ा हमें।
जिस्म से खेलकर मेरे दरिंदे बरी हो गये
तोहमतों को मगर उम्र भर उठाना पड़ा हमें
रस्मों के नाम पर कभी, जुल्मों के नाम पर
सुलगती आग में खुद को जाना पड़ा हमें
दुआओं के शहर में भी तू नहीं था मेरे मौला,
हर बार वहाँ से खाली हाथ आना पड़ा हमें
फिर कोई बेटी न पैदा हो तेरी ज़मीन पर,
ये सोचकर शम-ए-हयात बुझाना पड़ा हमें
इस पेट के लिये तो कभी बच्चों के वास्ते,
जहाँ पे जाना पाप है, वहीँ जाना पड़ा हमें।
यहाँ हर शख्स हर पल हादसा होने से डरता है
यहाँ हर शख्स हर पल
हादसा होने से डरता है
खिलौना है मिटटी का
फ़ना होने से डरता है
मेरे दिल के किसी कोने मै
एक मासूम सा बच्चा
बारूद की देख कर दुनिया
बढा होने से डरता है
अजब है ज़िन्दगी की क़ैद मै
दुनिया का हर इंसान
रिहाई मांगता है और
रिहा होने से डरता है ...
मेरा अंग अंग कुछ बोल गया
जब चली यूँ सावन की हवा
दिल के तारों को कोई छेड़ गया
वक्त के सर्द हुए लम्हों को
फ़िर से तू रूह में बिखेर गया
इक नशा सा छाया नस नस में
जब तू नज़रो से बोल गया
रंग बिखरे इन्द्र धनुष से
जब तू बस के साँसों में डोल गया
इक मीठी सी कसक उठी
जब हुई खबर तेरे आने की
फूलों की खुशबु सा महक कर
मेरा अंग अंग कुछ बोल गया
दिल के तारों को कोई छेड़ गया
वक्त के सर्द हुए लम्हों को
फ़िर से तू रूह में बिखेर गया
इक नशा सा छाया नस नस में
जब तू नज़रो से बोल गया
रंग बिखरे इन्द्र धनुष से
जब तू बस के साँसों में डोल गया
इक मीठी सी कसक उठी
जब हुई खबर तेरे आने की
फूलों की खुशबु सा महक कर
मेरा अंग अंग कुछ बोल गया
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